बैंकों के डार्क पैटर्न: 8 तरीकों से लगाते हैं ग्राहकों को चूना, RBI ने जुलाई 2026 तक हटाने का दिया आदेश

By Ashish Pandey

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भारतीय बैंक ऐप में डार्क पैटर्न दिखाते हुए स्क्रीनशॉट, छिपे चार्जेस और मैनिपुलेटिव डिजाइन
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“भारतीय बैंकों के डिजिटल प्लेटफॉर्म्स पर औसतन 4 से 7 डार्क पैटर्न इस्तेमाल हो रहे हैं। सर्वे में 57% यूजर्स ने बास्केट स्नीकिंग, 64% ने ड्रिप प्राइसिंग, 51% ने फोर्स्ड एक्शन की शिकायत की। RBI ने ‘रिस्पॉन्सिबल बिजनेस कंडक्ट अमेंडमेंट डायरेक्शन्स, 2026’ के ड्राफ्ट में सभी बैंकों को जुलाई 2026 तक ये भ्रामक डिजाइन हटाने का निर्देश दिया है, ताकि ग्राहक बिना धोखे के फैसले ले सकें।”

बैंकों में इस्तेमाल हो रहे प्रमुख डार्क पैटर्न और उनके तरीके

भारतीय बैंकिंग सेक्टर में डिजिटल ऐप्स और वेबसाइट्स पर डार्क पैटर्न का इस्तेमाल आम हो गया है। ये डिजाइन ट्रिक्स यूजर को वो काम करने पर मजबूर करती हैं जो वो मूल रूप से नहीं चाहता। हालिया सर्वे में सामने आया कि ज्यादातर बैंक 4 से 7 ऐसे पैटर्न यूज करते हैं।

1. ड्रिप प्राइसिंग (Drip Pricing) ट्रांजेक्शन शुरू करते समय कम फीस दिखाई जाती है, लेकिन आखिरी स्टेज पर एक्स्ट्रा चार्जेस जुड़ जाते हैं। 64% यूजर्स ने इसे महसूस किया। उदाहरण: IMPS को डिफॉल्ट चुनकर NEFT की बजाय 5 रुपये चार्ज लगाना, या ट्रांसफर कन्फर्मेशन के बाद स्टेटमेंट में छिपे 5-6 रुपये का डेबिट। इससे यूजर को लगता है ट्रांजेक्शन फ्री है, लेकिन अंत में ज्यादा पैसे कट जाते हैं।

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2. बास्केट स्नीकिंग (Basket Sneaking) चेकआउट के दौरान बिना स्पष्ट सहमति के एक्स्ट्रा चार्ज या सर्विस ऐड हो जाती है। 57% यूजर्स प्रभावित। बैंक ऐप में लोन या ट्रांसफर के समय इंश्योरेंस या सर्विस फीस डिफॉल्ट ऐड कर देते हैं, जिसे नोटिस करना मुश्किल होता है।

3. फोर्स्ड एक्शन (Forced Action) यूजर को अनचाही सर्विस सब्सक्राइब करने या ज्यादा पर्सनल डेटा शेयर करने पर मजबूर किया जाता है। 51% शिकायतें। जैसे, लोन अप्लाई करने के लिए अनिवार्य रूप से क्रेडिट कार्ड या इंश्योरेंस लेना पड़ना, या ऐप यूज के लिए अनचाहे परमिशन देना।

4. नेगिंग (Nagging) बार-बार पॉप-अप, नोटिफिकेशन या प्रॉम्प्ट्स से यूजर को परेशान किया जाता है। 46% यूजर्स ने रिपोर्ट किया। जैसे, बार-बार क्रेडिट कार्ड अपग्रेड या इंश्योरेंस खरीदने के लिए पुश मैसेज, जो बंद करना मुश्किल होता है।

5. बेट एंड स्विच (Bait & Switch) विज्ञापन में जीरो फीस अकाउंट या हाई इंटरेस्ट दिखाकर अप्लाई करने पर अलग, महंगे प्रोडक्ट थोपना। HDFC जैसे बैंकों में रिपोर्टेड उदाहरण जहां प्रॉमिस्ड टर्म्स बदल दिए जाते हैं।

6. फॉल्स अर्जेंसी (False Urgency) “सीमित समय ऑफर”, “अभी अप्लाई करें वरना मौका चूक जाएंगे” जैसे मैसेज से जल्दबाजी में फैसला करवाना। RBI ड्राफ्ट में इसे स्पष्ट रूप से प्रतिबंधित किया गया।

7. कन्फर्म शेमिंग (Confirm Shaming) ऑप्ट-आउट बटन को नेगेटिव तरीके से दिखाना, जैसे “नहीं, मुझे पैसे बचाने नहीं हैं” या “मैं बेवकूफ हूं”। इससे यूजर शर्मिंदगी महसूस कर ऑप्ट-इन कर लेता है।

8. सब्सक्रिप्शन ट्रैप (Subscription Trap) ट्रायल पीरियड के बाद ऑटो-रिन्यूअल, कैंसल करना जटिल बनाना। बैंक ऐप्स में क्रेडिट कार्ड या प्रीमियम सर्विस में ये आम।

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RBI के नए नियम और प्रभाव

RBI ने फरवरी 2026 में जारी ड्राफ्ट में स्पष्ट कहा कि जुलाई 2026 तक सभी बैंक डार्क पैटर्न-फ्री होने चाहिए। इसमें फोर्स्ड बंडलिंग (जैसे लोन के साथ इंश्योरेंस थोपना) भी बैन है। हर प्रोडक्ट के लिए अलग, स्पष्ट सहमति जरूरी। मिस-सेलिंग साबित होने पर फुल रिफंड और कंपेंसेशन। बैंक को यूजर टेस्टिंग और पीरियोडिक ऑडिट करना होगा।

ग्राहकों को क्या सावधानी बरतनी चाहिए

हर ट्रांजेक्शन से पहले फाइनल स्क्रीन चेक करें, छिपे चार्जेस देखें।

डिफॉल्ट ऑप्शन बदलें, जैसे NEFT चुनें IMPS की जगह।

अनचाहे पॉप-अप्स को इग्नोर करें, रिपोर्ट करें।

प्रोडक्ट अप्लाई करने से पहले सभी टर्म्स पढ़ें।

शिकायत हो तो बैंकिंग ओम्बड्समैन या RBI कंप्लेंट्स रजिस्टर करें।

ये डार्क पैटर्न ग्राहक विश्वास को कमजोर करते हैं और अनचाहे खर्च बढ़ाते हैं। RBI का कदम ग्राहकों के लिए राहत लाएगा।

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Ashish Pandey

My name is Ashish Pandey, I work as a content writer and I love to write articles. With 4 years of blogging experience I am always ready to inspire others and share knowledge to make them a successful blogger.

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